शमीक भट्टाचार्य संभालेंगे पश्चिम बंगाल भाजपा की कमान, जानिए कैसे बाक़ी पर पड़े भारी

बुधवार को दिल्ली से पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के फोन ने तमाम समीकरण बदल दिये | वैसे उससे पहले सोमवार को दिल्ली दौरे में भी उनको संभवतः इसका संकेत दे दिया गया था | पार्टी अध्यक्ष पद की दौड़ में अचानक शीर्ष पर पहुँचना और निर्विरोध चुना जाना शायद ख़ुद शमीक भट्टाचार्य के लिए भी यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था | लंबे समय तक राज्य में पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रहे, राज्यसभा सांसद शमीक भट्टाचार्य के लिये इस कुर्सी तक पहुँचना भले आसान रहा हो लेकिन आगे की राह बहुत आसान नहीं है | पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं, उससे पहले पार्टी की आंतरिक गुटबाज़ी को मात देना बड़ी चुनौती है | शमीक भट्टाचार्य के पास इसके लिए अधिकतम आठ-नौ महीने का ही समय है | पश्चिम बंगाल से बाहर शमीक भट्टाचार्य का नाम भले ज़्यादा लोग नहीं जानते हों लेकिन उनका राजनीतिक करियर काफ़ी लंबा है और वह एक सामान्य कार्यकर्ता से इस पद तक पहुँचे हैं | शमीक भट्टाचार्य साल 1974 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ “आरएसएस” से जुड़े थे | उसके बाद उनको दक्षिण हावड़ा मंडल का बीजेपी युवा मोर्चा का महासचिव बनाया गया, वह लगातार 11 साल तक इस पद पर रहे | उसके बाद लगातार तीन कार्यकाल तक प्रदेश बीजेपी के महासचिव भी रहे साथ ही साथ पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समिति और प्रदेश बीजेपी की कोर कमिटी के सदस्य भी रहे |

शमीक भट्टाचार्य ने बीजेपी के टिकट पर वर्ष 2006 में पहली बार श्यामपुर सीट से विधानसभा चुनाव लडे थे, लेकिन हार हुई, वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में शमीक बशीरहाट लोकसभा सीट से चुनाव हार गए थे, लेकिन उसी साल बशीरहाट दक्षिण विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में वह विजयी रहे |
इसके बाद शमीक भट्टाचार्य वर्ष 2019 में दमदम संसदीय सीट पर तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय से हार खानी पड़ी | वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में भी उनको हार का सामना करना पड़ा, फिर वर्ष 2024 में पार्टी ने उनको राज्यसभा में भेजा था | राहुल सिन्हा के अध्यक्ष बनने के बाद भी वह इस पद पर बने रहे, उसके बाद दिलीप घोष के अध्यक्ष बनने पर शमीक को पार्टी का मुख्य प्रवक्ता बनाया गया, लेकिन पार्टी में तब उनकी ख़ास अहमियत नहीं थी |
बीते महीने ऑपरेशन सिंदूर के सिलसिले में विदेश जाने वाले प्रतिनिधि मंडल में भी उनको शामिल किया गया था, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, “तृणमूल कांग्रेस चुनाव से पहले बीजेपी को बाहरी पार्टी बताती रही है, शमीक भट्टाचार्य का इस चुनौती से भी पार पाना है.” बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीती थीं, लेकिन विधायकों के पाला बदलने और उपचुनाव में हार के कारण यह तादाद घटकर 65 रह गई है | ऐसे में चुनाव से पहले विधायक दल और संगठन के बीच तालमेल को बेहतर बनाना भी उनके लिए एक बड़ी परीक्षा से कम नहीं है, विश्लेषकों का कहना है कि फ़िलहाल शमीक भट्टाचार्य की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की गुटबाज़ी को दूर करना है | पूर्व अध्यक्ष दिलीप घोष को हाल के महीनों में पार्टी के किसी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जा रहा है, इससे वह ख़ासे नाराज़ बताए जा रहे हैं |

